पुस्तक विवरण

जैन-जीवन-दर्शन की पृष्ठभूमि

प्रकाशन : - 1975

जैन धर्म दर्शन के २७ विषयों पर मौलिक शोध–लेख

भृगुवंश नाटक

प्रकाशन : - 1979

भृगुवंश मानव के पुरुषार्थ की ऐसी उदात्त गाथा है जो आदि से अंत तक अग्नि से तेजोदीप्त है -
प्रो. नामवर सिंह

तर्क संग्रह

प्रकाशन : - 1971

संस्कृतटीका तर्कदीपिका तथा लोकप्रिय छात्रोपयोगी मौलिक हिंदी व्याख्यान सहित

महाप्रज्ञ दर्शन

प्रकाशन : - 2002

महाप्रज्ञ की सारी चिंतन-धारा को ह्रदय-ग्राही बनाने वाला -
श्रीचन्द जी रामपुरिया

पातंजल योगसूत्र

प्रकाशन : - 2010

परीक्षार्थियो के लिए कल्पवृक्ष तथा आत्मकल्याणर्थियो के लिए प्रामाणिक मार्गदर्शक

वेद विद्या प्रवेशिका

प्रकाशन : - 1999/2000/2002

वेद विज्ञान में प्रवेश करने के लिए २१ पाठों की एक सरल पाठ्य पुस्तिका

वेद विद्या प्रवेशिका ( उड़िया अनुवाद )

प्रकाशन : - 2000

मूल हिंदी से उड़िया में अनुवाद, अनुवादक
डॉ. अच्युतानंद दास

ब्राह्मण ग्रन्थों का वैज्ञानिक दर्शन

प्रकाशन : - 2015

आचार्य दयानंद भार्गव का यह व्याख्यान ब्राह्मण ग्रंथो के वैज्ञानिक एवं दार्शनिक पक्ष को इतनी सहजता से उद्धाटित करता है कि ब्राह्मण ग्रंथो का मर्म पूरी तरह से हृदयंगम हो जाता है -
डॉ. रेणुका राठोड़

श्रीमदभगवद्गीता विपुलभाष्य

प्रकाशन : - 2010

प्रसन्न गंभीर शैली में लिखा गया यह भाष्य जहाँ एक और विद्वानों के मनस्तोष का हेतु बनेगा वहाँ साधकों के लिए साधनोपयोगी और जनसामान्य के लिए जीवनोपयोगी सामग्री भी उपलब्ध करायेगा -
आचार्य जुगल किशोर मिश्र, वाराणसी

वेदविज्ञानवीथिका

प्रकाशन : - 1996

जीव, ब्रह्म, विश्व, कर्म तथा देवता जैसे गंभीर विषयों का वेद पर आधृत विवेचन

व्योमवाद

प्रकाशन : - 1993

मूल संस्कृत, हिंदी अनुवाद, टिप्पणी तथा अंग्रेजी भूमिका सहित व्योम से सृष्टि के उद्धभव के सिद्धांत का विवेचन

ऋचारहस्य

प्रकाशन : - 1975

ऋग्वेद के पंद्रह रहस्यात्मक भावपूर्ण सूक्तों का मूल संस्कृत सहित पद्यानुवाद

वेदविज्ञानविमर्श

प्रकाशन : - 2015

इस ग्रन्थ में आचार्य भार्गव के वेद चिंतन का जो अमृत रसायन है वह निश्चय ही अन्यत्र अनुपलभ्य है क्योंकि इसका मूल उत्स ही अनितरसधारण है-
आचार्य अभिराज राजेंद्र मिश्र

समाज, साहित्य और दर्शन

प्रकाशन : - 2015

सामाजिक प्रश्नो एवं परम्परागत चिंतन के परिप्रेक्ष्य में विकास की अवधारणा पर लेख़क के विचार पठनीय और मननीय है -
डॉ. हरिराम आचार्य

जैन परम्परा

प्रकाशन : - 2015

यह जैन दर्शन के आधारभूत सिद्धांतो पर अधिकृत रूप से प्रकाश डालता है और आज के परिप्रेक्ष्य में उनकी प्रांसिगकता भी स्पष्ट करता है -
देवर्षि कलानाथ शास्त्री

वैदिक विज्ञान

प्रकाशन : - 1996-97

देव, ब्रह्म, दर्शन, धर्म तथा वेदांग पर १८ शोध निबंधों का संग्लन

संस्कृत वाङ्मय में समाज एवं राष्ट्र

प्रकाशन : - 2013

पूरे भारत के शिखरस्थ ३५ मनीषियों के समाज एवं राष्ट्र सम्बंधी मौलिक शोध आलेखों का संग्लन। आलेखों का व्यापक फलक वेद, स्मृति, रामायण, महाभारत, गीता, भागवत, श्रेण्य संस्कृत, जैन, बौद्ध, शिक्षा तथा मनोविज्ञान, से लेकर आधुनिक विज्ञान तथा अरविन्द तक फैला है।

आधुनिक संस्कृत साहित्य

प्रकाशन : - 2015

संस्कृत के आधुनिक लेखकों पर ३३ लेखों में अन्यत्र दुर्लभ सामग्री विस्तृत प्रस्तावना सहित

Jaina Ethics

Published in : - 1968

It embodies a comprehensive and systematic study of the Jaina view of life in its entirety. It is not only a scholarly contribution to Jaina Studies, but to Indian philosophy in general —
Donald W. Mitchwell

Jaina-tarka-bhasa

Published in : -1973

Above all a keen insight and the analytical mode of thinking that Dr Bhargava so well combines, has gone a long way in making this translation and elucidatory notes, that he has so thoughtfully added, both scholarly and useful to any student of Indian Logic in general and the Jaina Logic in particular—
Prof. R.C. Pandey

Yukti Dipika

Published in : - 1990-1992

The oldest commentary on Sankhyakarika rendered into English for the first time. This has been used in the Fourth Volume of Encyclopedia of Indian Philosophies Edited by Geralad
James Larson & Ram Shankar Bhattacharya

Integral Word-view of the Vedas

Published in : - 2007

Prof. Dayanand Bhargava’s work is a significant contribution to the cause of interpreting Vedic thought in a modern idiom—
Prof. K.V. Ramkrishnamacharyulu

Glimpses of Indian Philosophy and Sanskrit Literature

Published in : - 1981

Contains 32 research articles on different aspects of Indology.

Holistic Approach of the Vedas

Published in : - 2007

Needless to say that this work is very much relevant to the modern times as it propounds a holistic paradigm which is eco-friendly, based on sustainable development which combines peace with prosperity –
Prof Vachaspati Upadhyaya